चहनिया चन्दौली।
रिश्तों का महापर्व रंगोत्सव का स्वरूप अब दिन-प्रतिदिन बिगड़ता जा रहा है लोग सिर्फ रस्म अदायगी करके पर्व को अमली जामा पहना रहे है। बुजुर्गो का कहना है कि पहले की होली आपसी प्रेम सौहार्द मेल मिलाप झलकता था।

लोग एक पखवारे पूर्व से ही पर्व की तैयारियों में जुट जाते थे। होलिका के निर्माण व उसको बनाने में गांव के बच्चों व युवाओं की टोलिया बनाकर होलिका का आदर पूर्वक निर्माण की जाती थी और चट्टी चौराहो तथा मन्दिरों पर रात में फाग व चैता की मधुर गीतें गुजने लगती थी लोगबाग अबीर, गुलाल, केसर ठंढई का इस्तेमाल करते थे लेकिन दुर्भाग्य है कि आज की नई पीढ़ी का जो मास मदिर और अबीर गुलाल के जगह केमिकल युक्त पेंट कीचड़ गोबर फेककर मुर्खता पूर्ण होलियाना मूड का इजहार कर रहे है।

जिससे प्रेम व आपसी मिलन में दरारे पड़ने लगी है और भारत की ऐतिहासिक पर्व तिब्र गति से धूमिल होती जा रही है। गांव व शहर के संम्भ्रन्त घरो से बाहर नही निकलते होली के दिन लोगेा से मिलना-जुलना कम करते चले जा रहे है। जो एक गम्भीर सोचनीय बनता जा रहा है। इस संबंध में नामवर मिश्रा का कहना है कि जमाने की होली अब इस जमाने की होली से कोसो दूर भटक रही है अब की होली में सिर्फ हुड़दगई के सिवाय कुछ नही देखन को मिल रहा है। वही हीरामन प्रजापति 85 वर्ष का कहना है कि फागुन क आते ही गॉव-गिरॉव में होलियाना मुड जम जाता था लोग चट्टी चौराहे व मंदिरो पर एक पखवारे से फज्ञगगीत गानाशुरू कर देते थे।

जबकि हरगेन मिश्र पूर्व प्रधान का कहना है कि पहले के लोग प्राकृतिक चीजों का ही उपयोग करते थे। उपटन की यह परम्परा उसकी जीवन शैली की रक्षा करता है। जो स्वास्थ्य व होली की परम्परा की रक्षा करती है। वही ईश्वरीय नारायण 72 वर्ष का कहना है कि रस्म के जरिये बुराईयों व रोगेा के दूर करने का भाव प्रकट करता है होलिका में उत्तम अर्पित करना त्याग व शुद्धि का प्रतीक है।