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  • Trending जीजू ने सपने में छेड़ा और मुकदमा दर्ज हो गया
  • GYAN SHANKAR TRIPATHI - 11 Mar 2026

आज भले ही जीजू बरी हो गए, मगर उन्हें जेल और बेल के बीच कितना आर्थिक और मानसिक उत्पीड़न झेलना पड़ा होगा यह वही जानते होंगे, और जो उनकी इज्जत से खेल हो गया वह भी उन्हीं ने भुगता। मामला कानपुर का है। वहाँ एक साली ने पंद्रह साल की उम्र में नींद में एंटीबायोटिक दवा के असर से भ्रमित होकर सपना देखा कि उसके जीजा ने उसे पकड़ लिया है। इस सपने को उसने हकीकत समझ लिया और शोर मचा दिया। नतीजा यह हुआ कि एयरफोर्स कर्मी जीजा को उन्नीस दिन जेल में रहना पड़ा। सात साल बाद साली ने अदालत में सच कबूल किया और तब जाकर कोर्ट ने आरोपी को बरी किया।

  • बहरहाल हाल यह है कि छेड़खानी, रेप, दहेज उत्पीड़न और एसीएसटी एक्ट के फर्जी मामलों से न सिर्फ कोर्ट की फाइलें मोटी होती जा रही हैं बल्कि जेलों में कई बेगुनाह भी बंद हैं। मामूली विवादों को गंभीर बनाने के लिए लोग ऐसे फर्जी केस लगवाने से भी नहीं चूकते। कुछ साल पहले मेरे एक मित्र के जमीनी विवाद में उनके पड़ोसी ने अपनी पत्नी को आगे करके आरोप लगा दिया कि फलां व्यक्ति जमीन के विवाद में आया और वहीं खड़ी मेरी पत्नी का ब्लाउज फाड़ कर स्तन दबा दिया। सोचने वाली बात है कि जमीनी विवाद में आदमी वाद-विवाद करेगा, उग्रता दिखाएगा या सार्वजनिक तौर पर यौन उत्पीड़न करने लगेगा। ऐसे ही कई मामलों में होता यह है कि मामला कुछ और होता है और मुकदमा किसी और धाराओं में दर्ज हो जाता है।

भारतीय न्याय व्यवस्था अक्सर महिलाओं को पीड़ित मानकर चलती है और पुलिस भी अधिकांश मामलों में बिना ठोस पुष्टि के मुकदमा दर्ज कर देती है। अब एक बार आरोपी बन गए तो फिर झेलिए। कुछ वर्ष पहले एक फर्जी हॉस्पिटल संचालित होने की खबर पर बनारस के कुछ पत्रकार साथी कवरेज के लिए वहाँ गए। संचालक ने उनसे मारपीट कर दी। पत्रकार साथी मुकदमा दर्ज कराने थाने पहुंचे। पहले तो थानेदार ने मुकदमा दर्ज करने में हीलाहवाली की क्योंकि थाने-चौकी की बेगारी वह हॉस्पिटल वाला करता था। पत्रकार बार-बार थानेदार से घटनास्थल का स्थलीय निरीक्षण करने का आग्रह करते रहे, मगर थानेदार ने इसे जरूरी नहीं समझा। इसी बीच उस फर्जी हॉस्पिटल संचालक ने हॉस्पिटल का डीवीआर ही गायब कर दिया ताकि साक्ष्य न मिल सके।

उसके बाद वह अपनी दलित महिला स्टाफ के साथ थाने पहुंचा और कहा कि फलां-फलां लोग मेरी महिला स्टाफ को जाति सूचक गाली दिए, उसका स्तन दबाया और गुप्ता&%ग उंगली किया मने बेहद घिनौना आरोप लगाते हुए मुकदमा दर्ज करा दिया। यानी पत्रकारों के मुकदमे के बाद उसने क्रॉस केस कर दिया। सोचिए, पत्रकार कवरेज के लिए जा रहे हैं। उन्हें क्या पता कि कौन किस जाति का है। ऊपर से सब सीधे-साधे और बड़े चैनल के पत्रकार, जिन्हें मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ। बहरहाल पत्रकारों ने खासकर उस थानेदार को जमकर कोसा। हाल ही में उस थानेदार की लखनऊ में एक हादसे में मृत्यु हो गई तो उसी थानेदार के सरनेम वाले  पीड़ित पत्रकार ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा - मर गयल मादर* हम लोगों की आह लग गई।

बीते दिनों मैं एक जेल गया। वहाँ एक सजायाफ्ता व्हीलचेयर पर था। उसके दोनों पैर पोलियो ग्रस्त थे। मतलब उसे जमीन पर बैठा दो तो वह सिर्फ घसीटकर ही चल सकता है। उस पर रेप यानी बलात्कार का केस था और सजा भी हो गई। बलात्कार यानी जबरदस्ती, बलपूर्वक ताकत से कारित होना। मगर पोलियो ग्रस्त मरियल अपाहिज व्यक्ति मामूली विवाद का शिकार हो गया ऊपर से गरीब।

बहरहाल यह जानिए की छेड़खानी और रेप कानून के दुरुपयोग का आलम यह है कि जो देह व्यापार में लिप्त हैं उन्हें भी लगता है कि जब यही करना है तो पांच-दस हजार क्यों लें। किसी मालदार पुरुष को प्रेम जाल में फंसाओ, रिलेशनशिप बनाओ, और जब वह मांग पूरी करने से कतराए तो तहरीर लेकर थाने चले जाओ। मामला तहरीर तक पहुंचते ही डिमांड पूरी हो जाए तो ठीक, नहीं तो मुकदमा दर्ज कराओ और बाद में सुलह के नाम पर पैसे बनाओ। ऐसे मामलों में दरोगा इंचार्ज जी लोग भी इंटरेस्टेड होते हैं क्योंकि ऐसे मामलों में मोटा माल मिलता है। माल ले देकर सुलह समझौता करवा दो तो आरोपी हमेशा के लिए कृतज्ञ भी हो जाता है, बाद में आड़े-गाढ़े काम आता है और बेगारी भी करता है। दरोगा या इंस्पेक्टर रसिक हुआ तो आरोप लगाने वाली भी * बाकी समझ गए होंगे।

अंत में बस यही कहूंगा कि इस देश में जो भी कानून कठोरता से पीड़ितों को न्याय और दोषियों को दंड देने के लिए बनता है, उसका सर्वाधिक दुरुपयोग होता है। इसलिए सावधान रहें, सतर्क रहें। हर जगह "सपने में छेड़ा" टाइप की लड़कियां भी होती हैं। जब तक कानून उसके दुरुपयोग करने वालों और फर्जी मामले दर्ज कराने वालों पर सख्ती नहीं दिखाएगा, तब तक रेप, छेड़खानी, एसीएसटी और दहेज उत्पीड़न जैसे कानूनों का दुरुपयोग होता रहेगा और यह सब उगाही का औजार बना रहेगा।

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