Bureau Rrport-Sushil Kumar Prayagraj
प्रयागराज । प्रयागराज के सराय इनायत थाना क्षेत्र से आई यह खबर केवल एक कानूनी विवाद नहीं, बल्कि एक टूटते रिश्ते की कराह है। चकमुजमिल (मुंतजीपुर) के शिव बाबू आज जिस मानसिक दौर से गुजर रहे हैं, वह सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर जिद की जीत के लिए अपनों को ही घुटनों पर लाना कितना जायज है?
कानूनी लड़ाई और निजी नफरत का फर्क
तलाक का मुकदमा अदालतों में अपनी जगह है, लेकिन फोन पर गालियाँ और धमकियां देना कानून से परे एक इंसान की गरिमा को कुचलने जैसा है। शिव बाबू का आरोप है कि सालों से मुकदमा चलने के बाद भी उनकी पत्नी उन्हें सुकून से जीने नहीं दे रही हैं।
आत्मसम्मान पर चोट और मानसिक पीड़ा
जब एक पुरुष मीडिया के सामने आकर न्याय की गुहार लगाता है, तो समझ लीजिए कि पानी सिर से ऊपर जा चुका है। शिव बाबू आज अपनी ही पत्नी के व्यवहार से डरे और सहमे हुए हैं। क्या इस तरह का मानसिक उत्पीड़न किसी समस्या का समाधान हो सकता है?
अपनों को बेबस करके क्या हासिल होगा?
एक समय जिसे जीवनसाथी माना, आज उसे ही अधिकारियों के चक्कर लगाने पर मजबूर कर देना किसी की जीत नहीं है। अंत में जो बचता है, वह केवल कड़वाहट और बर्बादी होती है। किसी को इतना भी बेबस न करें कि वह अपना मानसिक संतुलन खो बैठे।
न्याय की आखिरी उम्मीद
पीड़ित शिव बाबू ने अब अपनी बात आला अधिकारियों और मीडिया के सामने रखी है। यह रिपोर्ट एक संदेश है कि रिश्तों की जंग में 'इंसान' को नहीं हारना चाहिए। आखिर बेगुनाह को प्रताड़ित करके हासिल क्या होगा?